अंक : 62 अक्टूबर-दिसम्बर 2014
कहानियां
mmmm जयनंदन : भगोड़ा
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राजेन्द्व लहरिया : एक विकृत चित्र-क्षृंखला त्रासघर

m अरुणा सव्बरवाल : स्वयं
m रंजना श्रीवास्तव : परछाइयां
m राजा सिंह : अवशेष-प्रणय
m डा. सुमन श्रीवास्तव : पहला कद
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स्कै बाबा : मिस वहीद अनुवाद : डा. साबिरा

कविताएं

m डा. पुनीता जैन : मंशा, खुलना देता है नए अर्थ
m हरिंदर राणावत : ये रिसती धारायें
m डा. मधुर नज्मी : ग़ज़लें
m अमृता राय पन्नेरी : बुरी औरतें, कुछ खुदगर्ज मांगें, पैरों के दाग
m मीनाक्षी जिजीविषा : ग़ज़लें
m अमेयकान्त : भगोरिया
m नवनीत नीरव : अजनबी शह

लघुकथाएं

m ज्ञानदेव मुकेश : आखिरी इच्छा
m हरप्रसाद पुष्पक : आश्वासन
m सुरजीत सिंह : गहराई
m मुकेश कुमार 'निर्विकार' : करुणा की कीमत

संवाद

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श्याम सुन्दर चौधरी : अलग रास्ता पकड़ने का आत्म संतोष

कथा नेपथ्य
m मधुरेश : सूखा पत्ता : एक राष्ट्रीय रूपक का ताप

मुद्दा

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विनोद शाही : क्यों खो दिया हिन्दी साहित्य ने 'अपना' इतिहास बोध?

आलेख
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राकेश कुमार सिंह :स्वाधीनताआंदोलनऔरआदिवासी साहित्य

m रामनाथ शिवेन्द्र : कथा का समाजशास्त्र और तीसरी दुनिया
m डा. चन्द्रभान सिंह यादव : दलित आत्मकथाओं में स्त्री और लोकजीवन

समसामयिक

m डॉ. राजकुमार : राजनीति का धर्म और धर्म की राजनीति
m शीला पाण्डेय : सुरक्षा के नुस्खे में सत्ता का मंत्र

राग लन्तरानी

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सुशील सिध्दार्थ : इस साल क्या बोलेंगे?

संपादकीय
इस सप्ताह
समकालीन कहानियों में

भगोड़ा:  जयनंदन

'मैं ने पहली बार यह महसूस किया कि अगर किसी वाहन से किसी को धक्का लग जाये तो धक्का खाने वाले आदमी से कम दुखी धक्का मारनेवाला नहीं होता। उस अवस्था में तो और भी ज्यादा जब धक्का खाये हुए आदमी को गिरा हुआ छोडक़र हम भाग निकलें। यहां गलती चाहे कोई करे, यह सवाल ज्यादा मानी नहीं रखता। यह आशंका साये की तरह चिपक जाती है दिल और दिमाग से कि पता नहीं उस आदमी को कितनी चोट लगी होगी? उसे तुरंत किसी ने अस्पताल पहुंचाया होगा या नहीं? उसकी माली हालत ऐसी होगी भी कि नहीं कि वह अपना इलाज करा सके। दरअसल मैं भागना नहीं चाहता था, लेकिन कार में पीछे बैठे मेरे बेटों और बहुओं ने एक स्वर से कहना शुरू कर दिया कि मैं बिना रुके यहां से निकल जांऊ। गति को धीमी होते देख ....VIEW

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 अवशेष-प्र्रणय:  राजा सिंह

सबेरा हो रहा था, वह अपनी गाडी क़े डिब्बे में बैठा, गाडी क़ी रफ्तार से होड़ लेता उसका मन भी भाग रहा था। उसे अपने शहर आना काफी अच्छा लगता है। कितनी यादें जुडी हैं शहर से, बचपन से लेकर जवानी तक। जब भी वह अपने घर, शहर आता है अच्छी, बुरी, मीठी, कडवी यादों के गिरफ्त आ जाता है । उसे तो कोई बहाना चाहिये आने का और आज तो ठोस कारण है अपने शहर आने का। उसके सहकर्मी के बहिन की शादी, उसके अपने शहर में। इसी बहाने घर के लोगों से मुलाकात हो जायेगी और सबके हाल-चाल भी मिल जायेंगे। शुरू-शुरू में ऐसा भी वक्त था, जब वह घर, अपने शहर जाना नहीं चाहता था। नहीं-नहीं घर से कोई नाराजगी, शिकायत नहीं थी, परन्तु उस समय घर और शहर का छुटना एक वरदान माफिक लगा था उसे। वह उस समय अवसाद की स्थिति में था।... VIEW

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एक विकृतृत चित्र-श्रृंखला का त्रासघर : राजेन्द्र लहरिया

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रवीन अब कहां है ...?' अपने सामने मौजूद यह सवाल मुझे किसी गौरैया के फुदकते चूजे की तरह मासूम लग रहा था,क्योंकि इसके साथ ही मेरे सामने एक और सवाल भी था जो मुझे किसी बदशक्ल खूंखार गीध की तरह डैने फडफ़डाता दिख रहा था 'रवीन आखिर क्याें घर में नहीं ह.ै ..?' रवीन वास्तव में रवीन्द्र प्रसाद था! रवीन्द्र प्रसाद उर्फ रवीन, एक जीनियस-एक कलाकार-एक चित्रकार, जिसका मानना था कि मनुष्यों की ये समूची दुनिया ही एक कलाकृति -एक चित्र -जैसी ही तो होती है ! ....रवीन से मेरी मुलाकात कुछ वर्षों पहले तब हुई थी, जब मेरी तरह वह भी उम्र का पचासा पार कर चुका था। उससे बातचीत करने के बाद,और उसके बारे में जानने के बाद, मैं हैरतजदा था कि अपने जन्म के बाद से लगभग चालीस सालों तक का जीवन ठेठ गांव में ही बिताने वाले शख्स के ताल्लुकात उस कला....VIEW

 

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